Skip to main content

Posts

Showing posts from November, 2007

ehsaas...

वो दिन अब बस  याद हैं जब आसमान  में सप्तऋषि ढूंढ कर खिलखिला पड़ते थे अरसा हुआ जब आसमान में तारों को टिम टिमाते हुए गौर से देखा था हमने वो सूर्योदय की आभा, सूर्यास्त की लालिमा, और चन्द्रमा की अठखेलियाँ करती चांदनी एक बारगी सोचना पड़ता है की सब शब्द कैसे दिखते होंगे हकीक़त में आसमान में कभी भरपूर समय होता था मनचाही हरकतें करने का पर अब प्रकृति की मासूम हरकतें महसूस करने की फुर्सत कहाँ हैं वो मस्त होकर बारिश में भीगना, बहते पानी में छप-छप करके चलना कहाँ गया सर्दी में रज़ाई में छिपकर गर्म मूंगफली चबाना अब तो दिन का उदय होता है AC बस  में अपने colleagues को मरहबा करके और अस्त होता है घनघोर अँधेरे में उसी AC बस से उतरने में मन करता है की काश जीवन चन्द्रमा की होता, हर रोज़ स्वरुप बदलता पर शायद जीवन सूर्य का प्रतिरूप है, सदा एक जैसी तीव्रता से प्रकाशमान जीवन इसी का नाम है, तो चलो बिस्तर पकड़ें, सुबह ८ की बस इंतज़ार कर रही है --- Wo din ab bas yaad hain jab asman mein 'saptrishi' dhoondh khilkhila padte the Arsa hua jab asmaan mein taron ko tim-timate hue gau...